भाजपा प्रदेश कार्यालय में अजीब नजारा: रानू पाराशर ने खुद संभाली मीडिया प्रभारी की कुर्सी

भाजपा प्रदेश कार्यालय में अजीब नजारा: रानू पाराशर ने खुद संभाली मीडिया प्रभारी की कुर्सी

08-02-2026 2:48 PM | Update Bharat
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भाजपा प्रदेश कार्यालय में अजीब नजारा: रानू पाराशर ने खुद संभाली मीडिया प्रभारी की कुर्सी

आज भाजपा प्रदेश कार्यालय में जो दृश्य सामने आया, उसने पार्टी के अनुशासन, नियम और संगठनात्मक व्यवस्था की पोल खोल दी। राजस्थान भाजपा के  द्वरा  प्रवक्ताओं की सूची के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा मानो एक प्रवक्ता ने स्वयं को प्रदेश मीडिया प्रभारी की भूमिका में स्थापित कर लिया हो।
सूची में शामिल रानू पाराशर का आज प्रदेश कार्यालय में जिस तरह प्रस्तुतिकरण और सम्मान किया गया, उससे यह संदेश साफ़ गया कि वह खुद को प्रवक्ता नहीं बल्कि मीडिया प्रभारी मान बैठी हैं। पार्टी जिन नियमों और मर्यादाओं की बात मंचों से करती है, उन्हीं नियमों की खुलेआम अवहेलना पार्टी कार्यालय के भीतर होती दिखी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पार्टी ने 65 प्रवक्ताओं की घोषणा की है, तो उनमें से कितने वास्तव में पार्टी का अधिकृत पक्ष रखने के लिए सक्षम हैं और कितने ऐसे हैं जो खुद को नियमों से ऊपर समझने लगे हैं। क्या यह पूरा मामला किसी राजनीतिक संरक्षण या सिफारिश का परिणाम है, जिसकी वजह से इस तरह का व्यवहार संभव हो पाया?
इससे पहले भी कई मौकों पर प्रदेश मीडिया प्रभारी की अनुपस्थिति में पार्टी कार्यालय में अनुशासन बना रहा, लेकिन इस बार का घटनाक्रम यह दर्शाता है कि या तो चयन प्रक्रिया में गंभीर चूक हुई है या फिर प्रवक्ताओं को पार्टी की गाइडलाइंस और आचरण की कोई स्पष्ट जानकारी ही नहीं दी गई।
रानू पाराशर सिर्फ एक प्रवक्ता हैं, इसके बावजूद जिस तरह आज उनका मंचन और व्यवहार रहा, उससे यही प्रतीत होता है कि मानो उन्हें नई जिम्मेदारी सौंप दी गई हो। इससे पार्टी के उन अनुभवी और अनुशासित कार्यकर्ताओं में भी नाराज़गी है, जो वर्षों से संगठन की बात नियमों के दायरे में रहकर रखते रहे हैं।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रदेश मीडिया प्रभारी प्रमोद वशिष्ठ इस पूरे मामले में कोई कार्रवाई करेंगे या फिर यह प्रकरण भी पहले की तरह चुपचाप दबा दिया जाएगा।

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आज भाजपा प्रदेश कार्यालय में जो दृश्य सामने आया, उसने पार्टी के अनुशासन, नियम और संगठनात्मक व्यवस्था की पोल खोल दी। राजस्थान भाजपा के  द्वरा  प्रवक्ताओं की सूची के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा मानो एक प्रवक्ता ने स्वयं को प्रदेश मीडिया प्रभारी की भूमिका में स्थापित कर लिया हो।
सूची में शामिल रानू पाराशर का आज प्रदेश कार्यालय में जिस तरह प्रस्तुतिकरण और सम्मान किया गया, उससे यह संदेश साफ़ गया कि वह खुद को प्रवक्ता नहीं बल्कि मीडिया प्रभारी मान बैठी हैं। पार्टी जिन नियमों और मर्यादाओं की बात मंचों से करती है, उन्हीं नियमों की खुलेआम अवहेलना पार्टी कार्यालय के भीतर होती दिखी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पार्टी ने 65 प्रवक्ताओं की घोषणा की है, तो उनमें से कितने वास्तव में पार्टी का अधिकृत पक्ष रखने के लिए सक्षम हैं और कितने ऐसे हैं जो खुद को नियमों से ऊपर समझने लगे हैं। क्या यह पूरा मामला किसी राजनीतिक संरक्षण या सिफारिश का परिणाम है, जिसकी वजह से इस तरह का व्यवहार संभव हो पाया?
इससे पहले भी कई मौकों पर प्रदेश मीडिया प्रभारी की अनुपस्थिति में पार्टी कार्यालय में अनुशासन बना रहा, लेकिन इस बार का घटनाक्रम यह दर्शाता है कि या तो चयन प्रक्रिया में गंभीर चूक हुई है या फिर प्रवक्ताओं को पार्टी की गाइडलाइंस और आचरण की कोई स्पष्ट जानकारी ही नहीं दी गई।
रानू पाराशर सिर्फ एक प्रवक्ता हैं, इसके बावजूद जिस तरह आज उनका मंचन और व्यवहार रहा, उससे यही प्रतीत होता है कि मानो उन्हें नई जिम्मेदारी सौंप दी गई हो। इससे पार्टी के उन अनुभवी और अनुशासित कार्यकर्ताओं में भी नाराज़गी है, जो वर्षों से संगठन की बात नियमों के दायरे में रहकर रखते रहे हैं।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रदेश मीडिया प्रभारी प्रमोद वशिष्ठ इस पूरे मामले में कोई कार्रवाई करेंगे या फिर यह प्रकरण भी पहले की तरह चुपचाप दबा दिया जाएगा।

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