“शोर बहुत है, पर ज़मीनी काम की आवाज़ कहीं खो गई — सियासत ऊपर से भारी, ज़मीन पर खाली”
“शोर बहुत है, पर ज़मीनी काम की आवाज़ कहीं खो गई — सियासत ऊपर से भारी, ज़मीन पर खाली”
31-01-2026 1:31 PM | Update Bharat
भाजपा के विभिन्न मोर्चों की नई सूचियां जारी होने के बाद संगठन में नई ऊर्जा भी दिखाई दे रही है और साथ ही राजनीतिक मंथन भी तेज हुआ है। पदभार ग्रहण समारोहों में उमड़ी भीड़ और भव्य आयोजनों ने माहौल को जरूर गर्म किया है, लेकिन असली कसौटी आज भी ज़मीन पर संगठन के काम की ही है।
भाजपा की असली ताकत हमेशा उसका कार्यकर्ता रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सूबे के मुख्यमंत्री स्वयं हैं। कभी एक छोटे से कार्यकर्ता के रूप में संगठन में काम करने वाले मुख्यमंत्री को पार्टी ने वह जिम्मेदारी सौंपी, जिसकी उन्होंने शायद कभी कल्पना तक नहीं की थी। आज उनका सफर हर कार्यकर्ता के लिए एक मिसाल है कि दिखावे से नहीं, बल्कि मेहनत, समर्पण और ज़मीनी काम से ही नेतृत्व तैयार होता है। इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कहीं देखने को मिले।
इसी सकारात्मक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ की कार्यशैली भी संगठन में नई संस्कृति स्थापित कर रही है। वे ऐसे पहले प्रदेशाध्यक्ष माने जा रहे हैं जो कार्यकर्ताओं से 1 to 1 संवाद करते हैं और सरलता से उपलब्ध रहते हैं। उनकी सादगी को कुछ लोग कमजोरी समझ बैठते हैं, जबकि हकीकत यह है कि कई वर्षों बाद पार्टी को ऐसा सरल स्वभाव का अध्यक्ष मिला है, जो संगठन और कार्यकर्ता के बीच की दूरी को कम करने का प्रयास कर रहा है।
मोर्चा स्तर पर भी कुछ चेहरे उम्मीद की किरण बने हैं। अल्पसंख्यक मोर्चा के हमीद खान मेवती एकमात्र ऐसे रिपीट पदाधिकारी हैं, जिन्हें उनके काम और संगठनात्मक दक्षता के आधार पर दोबारा जिम्मेदारी दी गई। वहीं महिला मोर्चा की नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष राखी राठौड़ ने सादगी भरे तरीके से पदभार संभालते हुए टीवी डिबेट और जनसंपर्क के माध्यम से पार्टी की नीतियों, खासकर महिलाओं से जुड़ी योजनाओं को प्रभावी ढंग से समाज तक पहुंचाया है।
इसी कड़ी में युवा मोर्चा के नवनियुक्त प्रदेशाध्यक्ष शंकर गोरा को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। शंकर गोरा जयपुर की चौमू विधानसभा क्षेत्र से आते हैं और सूत्र बताते हैं कि उस दौर में उनके प्रभाव से तत्कालीन विधायक राम लाल शर्मा को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था, जिसका असर चुनावी परिणामों में भी देखने को मिला। ऐसे में अब राम लाल शर्मा को भाजपा का मुख्य प्रवक्ता बनाए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह फैसला कहीं न कहीं शंकर गोरा से जुड़े पुराने राजनीतिक “दर्द” को कम करने का प्रयास तो नहीं है।
वहीं यह अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि आने वाले तीन वर्षों में कहीं चौमू की सियासी हवा शंकर गोरा के पक्ष में मोड़ने की रणनीति तो नहीं बन रही। यदि ऐसा होता है, तो मौजूदा विधायक शिखा मिल के लिए मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है, क्योंकि पूर्व विधायक राम लाल शर्मा और शंकर गोरा के बीच के राजनीतिक रिश्ते जगजाहिर माने जाते हैं। पार्टी इस पूरे घटनाक्रम के जरिए क्या संदेश देना चाहती है, यह तो शीर्ष नेतृत्व ही स्पष्ट कर सकता है, लेकिन हालिया पदभार ग्रहण समारोह में शंकर गोरा की शक्ति-प्रदर्शन जैसी मौजूदगी ने यह जरूर संकेत दे दिया है कि आने वाले चुनावों में राम लाल शर्मा को टिकट के लिए कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुछ जगहों पर पदभार ग्रहण को शक्ति प्रदर्शन का मंच बना दिया गया है। लाखों रुपये खर्च कर भीड़ जुटाना, गाड़ियों के काफिले और दिखावे की राजनीति कहीं न कहीं संगठन की मूल भावना से भटकाव का संकेत देती है। सवाल यह भी उठता है कि इतना खर्च आखिर आता कहां से है और पद मिलने के बाद यही लोग पार्टी के लिए ज़मीन पर कितना काम करते हैं।
आज भी कई बार पार्टी का सामान्य कार्यकर्ता, जिसे संगठन की “रीढ़ की हड्डी” कहा जाता है, उसे कार्यालय के गेट पर अपनी पहचान बतानी पड़ती है। अगर यही रीढ़ मजबूत होगी, तभी संगठन भी मजबूत रहेगा।
अब वक्त है संतुलन बनाने का। मंचों की तालियों से ज्यादा जरूरी है बूथ स्तर पर संगठन की मजबूती, आम जनता से सीधा संवाद और जमीन पर परिणाम दिखाने वाला काम। भाजपा की पहचान हमेशा जमीन से जुड़ी राजनीति रही है और यदि यही रास्ता अपनाया गया, तो आने वाला समय संगठन के लिए और मजबूत साबित हो सकता है।
नोट (डिस्क्लेमर):
यह खबर राजनीतिक मंथन और विश्लेषण पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार किसी भी व्यक्ति, संगठन या पदाधिकारी के प्रति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी प्रकार का व्यक्तिगत आरोप, समर्थन या सरोकार नहीं दर्शाते। यह सामग्री पूरी तरह पत्रकारिता और जनहित के दृष्टिकोण से प्रस्तुत की गई है।






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