“मजबूत मीडिया रणनीति की ओर भाजपा, प्रवक्ताओं को दिए नए दिशा-निर्देश”

“मजबूत मीडिया रणनीति की ओर भाजपा, प्रवक्ताओं को दिए नए दिशा-निर्देश”

22-03-2026 8:52 PM | Update Bharat
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राजस्थान भाजपा के मीडिया विभाग की हाल ही में आयोजित बैठक के बाद पार्टी के प्रवक्ता तंत्र को लेकर कई अहम सवाल खड़े हो गए हैं। बैठक में प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने प्रवक्ताओं एवं पैनलिस्ट को निर्देश दिए कि केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं तथा उपलब्धियों को मीडिया में तथ्यात्मक, प्रभावी और सकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाए।
बैठक में प्रदेश महामंत्री श्रवण बगड़ी, भूपेंद्र सैनी, प्रदेश मंत्री डॉ. अपूर्वा सिंह, मीडिया संयोजक प्रमोद वशिष्ठ, मुख्य प्रवक्ता रामलाल शर्मा, महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष राखी राठौड़, आईटी संयोजक अविनाश जोशी और सोशल मीडिया संयोजक हीरेंद्र कौशिक सहित कई पदाधिकारी और प्रवक्ता मौजूद रहे।
हालांकि बैठक के बाद पार्टी के 65 प्रवक्ताओं की सूची और उनकी सक्रियता को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, इन 65 में से करीब 20 प्रवक्ता ही ऐसे हैं जो टीवी डिबेट या सार्वजनिक मंचों पर प्रभावी तरीके से पार्टी का पक्ष रख पाते हैं, जबकि शेष प्रवक्ताओं की भूमिका सीमित नजर आती है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि कई प्रवक्ताओं की नियुक्ति में योग्यता के बजाय सिफारिश और “सेटिंग” को प्राथमिकता दी गई, जिसके चलते कई ऐसे चेहरे सूची में शामिल हो गए जिनकी न तो मीडिया में सक्रिय उपस्थिति है और न ही संगठनात्मक पकड़ मजबूत मानी जाती है। कुछ प्रवक्ताओं के बारे में यह भी चर्चा है कि उनका मीडिया जगत से बुनियादी संपर्क तक नहीं है।
इधर, पार्टी के भीतर अनुशासन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हाल के दिनों में एक महिला प्रवक्ता द्वारा मीडिया प्रभारी की कुर्सी पर बैठकर उसे अपना कार्यालय बताने की घटना ने संगठनात्मक मर्यादा पर भी चर्चा छेड़ दी है।
दूसरी ओर, पार्टी के कई कार्यकर्ता बिना किसी पद के भी जमीनी स्तर पर सक्रिय रहते हुए पार्टी की नीतियों को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचा रहे हैं, लेकिन उन्हें प्रवक्ता बनने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। इसे लेकर भी अंदरूनी असंतोष की बात सामने आ रही है।
राज्य में आगामी निकाय और पंचायत चुनावों की आहट के बीच अब पार्टी के सामने प्रवक्ताओं की भूमिका और उनकी उपयोगिता को लेकर चुनौती बढ़ गई है। एक ओर प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ संगठन में संतुलन बनाने में जुटे हैं, वहीं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सरकार की योजनाओं को जमीन पर उतारने में सक्रिय हैं। ऐसे में इन योजनाओं को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की जिम्मेदारी प्रवक्ताओं पर ही निर्भर मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते प्रवक्ता तंत्र को मजबूत नहीं किया गया, तो बड़ी संख्या में प्रवक्ता “पहचान कौन” की स्थिति में ही सीमित रह सकते हैं।

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22-03-2026 8:52 PM | Update Bharat
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राजस्थान भाजपा के मीडिया विभाग की हाल ही में आयोजित बैठक के बाद पार्टी के प्रवक्ता तंत्र को लेकर कई अहम सवाल खड़े हो गए हैं। बैठक में प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने प्रवक्ताओं एवं पैनलिस्ट को निर्देश दिए कि केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं तथा उपलब्धियों को मीडिया में तथ्यात्मक, प्रभावी और सकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाए।
बैठक में प्रदेश महामंत्री श्रवण बगड़ी, भूपेंद्र सैनी, प्रदेश मंत्री डॉ. अपूर्वा सिंह, मीडिया संयोजक प्रमोद वशिष्ठ, मुख्य प्रवक्ता रामलाल शर्मा, महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष राखी राठौड़, आईटी संयोजक अविनाश जोशी और सोशल मीडिया संयोजक हीरेंद्र कौशिक सहित कई पदाधिकारी और प्रवक्ता मौजूद रहे।
हालांकि बैठक के बाद पार्टी के 65 प्रवक्ताओं की सूची और उनकी सक्रियता को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, इन 65 में से करीब 20 प्रवक्ता ही ऐसे हैं जो टीवी डिबेट या सार्वजनिक मंचों पर प्रभावी तरीके से पार्टी का पक्ष रख पाते हैं, जबकि शेष प्रवक्ताओं की भूमिका सीमित नजर आती है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि कई प्रवक्ताओं की नियुक्ति में योग्यता के बजाय सिफारिश और “सेटिंग” को प्राथमिकता दी गई, जिसके चलते कई ऐसे चेहरे सूची में शामिल हो गए जिनकी न तो मीडिया में सक्रिय उपस्थिति है और न ही संगठनात्मक पकड़ मजबूत मानी जाती है। कुछ प्रवक्ताओं के बारे में यह भी चर्चा है कि उनका मीडिया जगत से बुनियादी संपर्क तक नहीं है।
इधर, पार्टी के भीतर अनुशासन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। हाल के दिनों में एक महिला प्रवक्ता द्वारा मीडिया प्रभारी की कुर्सी पर बैठकर उसे अपना कार्यालय बताने की घटना ने संगठनात्मक मर्यादा पर भी चर्चा छेड़ दी है।
दूसरी ओर, पार्टी के कई कार्यकर्ता बिना किसी पद के भी जमीनी स्तर पर सक्रिय रहते हुए पार्टी की नीतियों को प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचा रहे हैं, लेकिन उन्हें प्रवक्ता बनने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। इसे लेकर भी अंदरूनी असंतोष की बात सामने आ रही है।
राज्य में आगामी निकाय और पंचायत चुनावों की आहट के बीच अब पार्टी के सामने प्रवक्ताओं की भूमिका और उनकी उपयोगिता को लेकर चुनौती बढ़ गई है। एक ओर प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ संगठन में संतुलन बनाने में जुटे हैं, वहीं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सरकार की योजनाओं को जमीन पर उतारने में सक्रिय हैं। ऐसे में इन योजनाओं को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने की जिम्मेदारी प्रवक्ताओं पर ही निर्भर मानी जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि समय रहते प्रवक्ता तंत्र को मजबूत नहीं किया गया, तो बड़ी संख्या में प्रवक्ता “पहचान कौन” की स्थिति में ही सीमित रह सकते हैं।

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