मशाल जुलूस छोटा, सवाल बड़े: महिला मोर्चा की तैयारी फेल, मदन राठौड़ की नाराज़गी चर्चा में ।

मशाल जुलूस छोटा, सवाल बड़े: महिला मोर्चा की तैयारी फेल, मदन राठौड़ की नाराज़गी चर्चा में ।

30-04-2026 12:13 PM | Update Bharat
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महिला आरक्षण को लेकर पिछले कई दिनों से भाजपा महिला मोर्चा द्वारा कांग्रेस के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं, लेकिन इन प्रदर्शनों की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। जयपुर में हुए हालिया कार्यक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि महिला मोर्चा की पकड़ महिलाओं के बीच बेहद कमजोर नजर आ रही है।
कुछ दिन पहले नारी शक्ति वंदन बिल को लेकर आयोजित बड़े कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, डिप्टी सीएम दिया कुमारी, प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ और जयपुर सांसद मंजू शर्मा जैसे बड़े नेता शामिल हुए। कार्यक्रम में शुरुआत में भीड़ जरूर नजर आई, लेकिन जैसे-जैसे रैली आगे बढ़ी, महिलाओं की संख्या तेजी से घटती गई। हालात यहां तक पहुंच गए कि बैरिकेड्स तक पहुंचते-पहुंचते केवल 20–25 महिलाएं ही बचीं।
इसके बाद आयोजित मशाल जुलूस में भी वही स्थिति दोहराई गई। यह कोई मंचीय कार्यक्रम नहीं था, बल्कि अमर जवान ज्योति से अंबेडकर सर्किल तक करीब 400 मीटर का मार्च था। बड़े नेता मौजूद रहे, लेकिन जमीनी स्तर पर महिला कार्यकर्ताओं की कमी साफ दिखाई दी। हालात तब और असहज हो गए जब महिलाएं नेताओं की बात सुनने के बजाय फोटो सेशन में ज्यादा दिलचस्पी दिखाती नजर आईं। कई बार समझाने के बावजूद जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ नाराज़ होकर कार्यक्रम स्थल से निकल गए।
सूत्रों के अनुसार, महिला मोर्चा में जिन पदाधिकारियों को जिम्मेदारियां दी गई हैं, उनमें से अधिकांश का जमीनी स्तर पर कोई खास जनाधार नहीं है। महिलाओं को कार्यक्रम में लाने के लिए साड़ी, मुलाकात और अन्य प्रलोभनों का सहारा लिया जा रहा है। यही वजह है कि महिलाएं केवल एक बार आती हैं, लेकिन संगठन से स्थायी रूप से नहीं जुड़तीं।
महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष राखी राठौड़ का अनुभव होने के बावजूद, उनकी टीम महिलाओं के बीच मजबूत पकड़ बनाने में नाकाम साबित हो रही है। यदि संगठन में वास्तव में जनाधार होता, तो हर कार्यक्रम में महिलाओं की इतनी कम उपस्थिति नहीं दिखती।
वहीं दूसरी ओर, यह जरूर कहा जा सकता है कि प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का नाराज़ होना उनके संगठन के प्रति गंभीर रवैये को दर्शाता है। उन्होंने बार-बार कार्यकर्ताओं को समझाने की कोशिश की, जो उनकी नेतृत्व क्षमता और जिम्मेदारी को दिखाता है। इसी तरह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का नेतृत्व भी कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
कुल मिलाकर, महिला मोर्चा की रणनीति और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि वास्तव में महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रभावी आंदोलन करना है, तो दिखावे और प्रलोभनों से ऊपर उठकर महिलाओं को जमीनी स्तर पर जोड़ना होगा। वरना भीड़ तो जुट सकती है, लेकिन जनसमर्थन नहीं।


नेता बनाना आसान है, लेकिन जननेता बनने के लिए मेहनत, विश्वास और जमीनी जुड़ाव जरूरी होता है—जो फिलहाल महिला मोर्चा में नजर नहीं आ रहा।

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30-04-2026 12:13 PM | Update Bharat
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महिला आरक्षण को लेकर पिछले कई दिनों से भाजपा महिला मोर्चा द्वारा कांग्रेस के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं, लेकिन इन प्रदर्शनों की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। जयपुर में हुए हालिया कार्यक्रमों ने यह साफ कर दिया है कि महिला मोर्चा की पकड़ महिलाओं के बीच बेहद कमजोर नजर आ रही है।
कुछ दिन पहले नारी शक्ति वंदन बिल को लेकर आयोजित बड़े कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, डिप्टी सीएम दिया कुमारी, प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ और जयपुर सांसद मंजू शर्मा जैसे बड़े नेता शामिल हुए। कार्यक्रम में शुरुआत में भीड़ जरूर नजर आई, लेकिन जैसे-जैसे रैली आगे बढ़ी, महिलाओं की संख्या तेजी से घटती गई। हालात यहां तक पहुंच गए कि बैरिकेड्स तक पहुंचते-पहुंचते केवल 20–25 महिलाएं ही बचीं।
इसके बाद आयोजित मशाल जुलूस में भी वही स्थिति दोहराई गई। यह कोई मंचीय कार्यक्रम नहीं था, बल्कि अमर जवान ज्योति से अंबेडकर सर्किल तक करीब 400 मीटर का मार्च था। बड़े नेता मौजूद रहे, लेकिन जमीनी स्तर पर महिला कार्यकर्ताओं की कमी साफ दिखाई दी। हालात तब और असहज हो गए जब महिलाएं नेताओं की बात सुनने के बजाय फोटो सेशन में ज्यादा दिलचस्पी दिखाती नजर आईं। कई बार समझाने के बावजूद जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ नाराज़ होकर कार्यक्रम स्थल से निकल गए।
सूत्रों के अनुसार, महिला मोर्चा में जिन पदाधिकारियों को जिम्मेदारियां दी गई हैं, उनमें से अधिकांश का जमीनी स्तर पर कोई खास जनाधार नहीं है। महिलाओं को कार्यक्रम में लाने के लिए साड़ी, मुलाकात और अन्य प्रलोभनों का सहारा लिया जा रहा है। यही वजह है कि महिलाएं केवल एक बार आती हैं, लेकिन संगठन से स्थायी रूप से नहीं जुड़तीं।
महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष राखी राठौड़ का अनुभव होने के बावजूद, उनकी टीम महिलाओं के बीच मजबूत पकड़ बनाने में नाकाम साबित हो रही है। यदि संगठन में वास्तव में जनाधार होता, तो हर कार्यक्रम में महिलाओं की इतनी कम उपस्थिति नहीं दिखती।
वहीं दूसरी ओर, यह जरूर कहा जा सकता है कि प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का नाराज़ होना उनके संगठन के प्रति गंभीर रवैये को दर्शाता है। उन्होंने बार-बार कार्यकर्ताओं को समझाने की कोशिश की, जो उनकी नेतृत्व क्षमता और जिम्मेदारी को दिखाता है। इसी तरह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का नेतृत्व भी कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
कुल मिलाकर, महिला मोर्चा की रणनीति और कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि वास्तव में महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर प्रभावी आंदोलन करना है, तो दिखावे और प्रलोभनों से ऊपर उठकर महिलाओं को जमीनी स्तर पर जोड़ना होगा। वरना भीड़ तो जुट सकती है, लेकिन जनसमर्थन नहीं।


नेता बनाना आसान है, लेकिन जननेता बनने के लिए मेहनत, विश्वास और जमीनी जुड़ाव जरूरी होता है—जो फिलहाल महिला मोर्चा में नजर नहीं आ रहा।

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