IPL पास की राजनीति में फंसी भाजपा! कार्यकर्ता नाराज़, छोटे पदाधिकारी बने ‘बलि के बकरे’?
IPL पास की राजनीति में फंसी भाजपा! कार्यकर्ता नाराज़, छोटे पदाधिकारी बने ‘बलि के बकरे’?
20-05-2026 3:44 PM | Update Bharat.jpeg)
सरकारें आती हैं और चली जाती हैं,
लेकिन किसी भी पार्टी की असली ताकत उसका कार्यकर्ता होता है। वही कार्यकर्ता जो धूप में झंडा उठाता है, रातों में पोस्टर लगाता है और चुनाव के समय घर-घर जाकर पार्टी के लिए माहौल बनाता है।
लेकिन जब उसी कार्यकर्ता को अपने ही संगठन में उपेक्षा महसूस होने लगे, तो नाराज़गी सिर्फ नाराज़गी नहीं रहती, अंदरूनी असंतोष का संकेत बन जाती है।
जयपुर स्थित भाजपा प्रदेश कार्यालय में कल कुछ ऐसा ही देखने को मिला। मामला IPL पास का था। कार्यकर्ताओं का आरोप था कि वे दोपहर 12 बजे से पास मिलने की उम्मीद लेकर बैठे थे, लेकिन जिन लोगों ने सालों तक पार्टी के लिए मेहनत की, उन्हें ही इधर-उधर घुमाया जा रहा था।
हालांकि पिछले कई मैचों में बड़ी संख्या में पासों का वितरण हुआ था। कार्यकर्ताओं से लेकर कर्मचारियों और यहां तक कि पदाधिकारियों तक को IPL के पास दिए गए। लेकिन विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते मांग भी उतनी ही बड़ी होना स्वाभाविक है।
पास की भी एक सीमा होती है, हर किसी को देना संभव नहीं होता। यह बात संगठन के जिम्मेदार लोग भी जानते हैं।
लेकिन कल जो दृश्य भाजपा कार्यालय में देखने को मिला, उसने कई सवाल खड़े कर दिए। ऐसा लगा जैसे बड़े पदाधिकारियों ने अपना “सिरदर्द” छोटे पदाधिकारियों के कंधों पर डाल दिया हो। राजनीति ऊपर खेली गई और गालियां नीचे वालों ने सुनीं।
आखिरकार संगठन में “बलि का बकरा” कौन बनता है, यह कल भाजपा कार्यालय में साफ दिखाई दे गया।
स्थिति उस समय और ज्यादा असहज हो गई जब एक युवा मोर्चा पदाधिकारी ने पास मांग रहे कार्यकर्ता को “कांग्रेस का” बता दिया।
जबकि उन्हीं लोगों में एक ऐसा परिवार भी शामिल था जिनके पिता स्वर्गीय श्री भैरो सिंह जी के ड्राइवर रह चुके थे और जिनकी कई पीढ़ियां भाजपा से जुड़ी रही हैं।
सवाल यही उठता है कि जो परिवार वर्षों से पार्टी के साथ खड़ा हो, वह अचानक विरोध करने पर “दूसरी पार्टी” का कैसे हो जाता है?
सियासत का सबसे कड़वा सच शायद यही है —
नेता दल बदल लेते हैं,
लेकिन कार्यकर्ता आखिरी समय तक अपनी पार्टी का ही रहता है।
खैर, कल IPL का आखिरी मैच था, इसलिए पार्टी नेताओं ने शायद राहत की सांस जरूर ली होगी।
लेकिन राजनीति में नाराज़ कार्यकर्ता की खामोशी कई बार आने वाले तूफान का संकेत भी होती है।
क्योंकि कार्यकर्ता ही किसी भी पार्टी की रीढ़ की हड्डी होता है… और जब रीढ़ कमजोर होने लगे, तो सबसे मजबूत संगठन भी लंबे समय तक सीधा खड़ा नहीं रह पाता।
.jpeg&w=3840&q=75)














